छात्र आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों पर फैसला हसीना को फांसी की सजा – Jan Jan Tak
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छात्र आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों पर फैसला हसीना को फांसी की सजा

Byjan_jantak

Nov 18, 2025

पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान कमाल को भी मौत की सज़ा गोली चलवाने वाले पुलिस चीफ को बस 5 साल जेल

बांग्लादेश की एक ट्रिब्यूनल अदालत ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया. अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को मौत की सजा दी.

यह सजा उन्हें 2024 के जुलाई-अगस्त के बीच हुए छात्र आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए दी गई है. हालांकि, इस केस के तीसरे आरोपी और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को मौत की सजा नहीं दी गई. उन्हें सिर्फ 5 साल की जेल हुई, क्योंकि उन्होंने अपनी गलती मान ली और सरकार की तरफ से गवाह बनकर केस में मदद की. शेख हसीना फिलहाल भारत में निर्वासन (एक्साइल) में रह रही हैं और उन्होंने अदालत के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है. वहीं असदुज्जमान खान भी फरार हैं.

लेकिन अल-मामून इस वक्त जेल में हैं. चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून ने अदालत में अपनी गलती मान ली थी और कहा था कि वे सरकार की ओर से गवाह बनना चाहते हैं. जुलाई में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-1 ने उनकी याचिका मान ली थी और उन्हें सरकारी गवाह बनने की इजाज़त दे दी थी. मुख्य अभियोजक मोहम्मद ताजुल इस्लाम ने बताया कि अदालत में मामून से पूछा गया था कि क्या वे अपने ऊपर लगे आरोपों को मानते हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा, “हां, मैं आरोप स्वीकार करता हूं और सच्चाई सामने लाने में अदालत की मदद करना चाहता हूं.” सितंबर में जब वे सरकारी गवाह के रूप में अदालत में पेश हुए, तब उन्होंने कहा कि जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं के पीछे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल के सीधे आदेश थे. उन्होंने अदालत में कहा – “यह नरसंहार शेख हसीना और असदुज्जमान के आदेश पर हुआ था. कृपया मुझे माफ कर दीजिए.” मामून ने देश और पीड़ितों के परिवारों से औपचारिक रूप से माफी भी मांगी.

2024 के जुलाई आंदोलन में जिन छात्रों और प्रदर्शनकारियों की जान गई, उनके परिवार मामून को मिली सिर्फ 5 साल की सजा से गुस्से में हैं. एक पीड़ित परिवार के सदस्य ने स्थानीय मीडिया समाचार चैनल से कहा, “हसीना और असदुज्जमान को तो फांसी मिली, लेकिन मामून जिसने हमारे बच्चों पर हेलिकॉप्टर से गोली चलाई, उसे सिर्फ पांच साल की जेल? यह सजा नहीं है.”

बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के नेता और उस आंदोलन के प्रमुख छात्र नेता मीर स्निग्धो ने कहा कि वे मामून की सजा के खिलाफ अपील करेंगे. उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि मामून के लिए कम से कम उम्रकैद की सजा हो. पांच साल बहुत कम है.” उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा, “हम मामून की पांच साल की सजा के खिलाफ अपील करेंगे. या तो उम्रकैद होनी चाहिए, या फिर और सख्त सजा.” पूरे मामले ने बांग्लादेश की राजनीति में हलचल मचा दी है. देश में यह बहस तेज हो गई है कि क्या राज्य गवाह बनकर कोई आरोपी इतनी बड़ी सज़ा से बच सकता है – खासकर तब जब उस पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप हो. फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया कि 2024 के छात्र विद्रोह ने जिस तरह शासन व्यवस्था को चुनौती दी थी, उसके राजनीतिक प्रभाव आज भी बेहद गहरे हैं.

पूर्व पीएम ने ICT को बताया `फर्जी अदालत` बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को `पूरी तरह पक्षपातपूर्ण, राजनीतिक रूप से प्रेरित और अवैध` करार दिया है. सजा के ऐलान के बाद किसी न्यूज चैनल को नई दिल्ली से दिए अपने पहले इंटरव्यू में 78 वर्षीय शेख हसीना ने आजतक से कहा कि यह फैसला एक `फर्जी और तथाकथित अदालत` का है जिसे कोई जनादेश प्राप्त नहीं है.

सोची-समझी साजिश या संयोग?

बांग्लादेश की सत्ता से बेदखल की जा चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए 17 नवंबर हमेशा एक गहरी याद छोड़ते आया है. 17 नवंबर को उनका मैरिज एनिवर्सरी होता है. इसी दिन उन्होंने प्रतिष्ठित भौतिक विज्ञानी एमए वाजेद मियां से हुई थी.

इसी खास मौके के दिन शेख हसीना को बांग्लादेश की अदालत ने मौत की सजा सुनाई है. अब इसको लेकर चर्चा तेज है कि क्या बांग्लादेशी कोर्ट ने यह तारीख सोची-समझी रणनीति के तहत तय किया? सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया है कि क्या 17 नवंबर को जान-बूझकर फेसले के लिए चुना गया. शुरुआत में ट्रायल पूरा होने के बाद ICT ने फैसला 14 नवंबर को सुनाने का एलान किया था. लेकिन 13 नवंबर को अचानक इसकी तारीख बदलकर 17 नवंबर कर दी गई. इसी बदलाव ने बहस को हवा दे दी कि क्या यह सब राजनीतिक मकसद से किया गया.

फेसबुक और X पर बांग्लादेशी यूज़र्स दो खेमों में बंट गए. कुछ का कहना है कि यह “कोई संयोग नहीं” बल्कि जानबूझकर हसीना को निजी तौर पर अपमानित करने की रणनीति थी. वहीं द डेली स्टार और देश रुपांतोर जैसे मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट किया कि लोग इस तारीख को लेकर बड़े पैमाने पर चर्चा कर रहे हैं – कई इसे “दुर्भाग्यपूर्ण संयोग” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “राजनीतिक बदला” मानते हैं. कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने आरोप लगाया कि मोहम्मद यूनुस, जो अंतरिम सरकार के प्रमुख हैं, ने “कपटपूर्वक” तारीख बदलवाई ताकि हसीना को उनकी सालगिरह के दिन सजा मिले. कई पोस्ट में यह भी लिखा गया, “17 नवंबर, हसीना की शादी से मौत की सजा तक की कहानी बन गया.”

फैसले के बाद अवामी लीग और शेख हसीना ने पूरी प्रक्रिया को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताया. उन्होंने ICT को एक “रिग्ड ट्रिब्यूनल” कहा जिसका उद्देश्य अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना है. हसीना का कहना है कि उन्हें निष्पक्ष बचाव का मौका नहीं मिला और फैसला पहले से तय था. शेख हसीना के पति एम ए वाजेद मियां का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा. 1963 में उन्होंने पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन में काम शुरू किया था, लेकिन उनकी नौकरी “अन्यायपूर्ण तरीके से” खत्म कर दी गई. बाद में 1971 की आजादी के बाद वे बांग्लादेश एटॉमिक एनर्जी कमीशन से जुड़े. उन्होंने विज्ञान और राजनीति पर कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखीं.

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